बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक
-
सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ
उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली
की साइकिल पर ...
1 day ago


No comments:
Post a Comment