मान और अपमान हमें, सब दौर लगे पागलपन के
कांटे फूल मिले जितने भी, स्वीकारे पूरे मन से
इस दुनिया में कोई न रहा, सब नामी और अनाम गए
पता नहीं सब कहां गए, कुछ सुबह गए कुछ शाम गए...
आज ये पढ़ा अच्छा लगा सो आप तक भेज रहा हूँ
उम्मीद है कि पसंद आएगा
बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक
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सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ
उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली
की साइकिल पर ...
1 day ago

